वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है।
समस्त
चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही हैं। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह
आज एक सर्वमान्य शाश्वत सच्चाई है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे
जगत का कर्ता-धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक। यह सर्व
प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी हैं। ऋग्वेद के अनुसार
देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने ``चक्षो सूर्यो
जायत'' कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छांदोग्यपनिषद में सूर्य को
प्रणव निरुपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया
है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध
गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत
की उत्पत्ति का एकमात्र कारण निरुपित किया गया है और उन्हीं को संपूर्ण जगत
की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार
संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते हैं। सूर्य ही संपूर्ण
जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में
सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी,
बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र-तत्र सूर्य मंदिरों का निर्माण
हुआ।
भविष्य
पुराण में ब्रह्मा-विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा तथा मंदिर
निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है
कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्रीकृष्ण पुत्र सांब ने सूर्य
की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुिक्त पायी थी। प्राचीन काल में भगवान
सूर्य के अनेक मंदिर भारत में बने हुए थे। उनमें से कुछ आज विश्व प्रसिद्ध
हैं। कोणार्क का सूर्य मंदिर उनमें से एक है। वैदिक साहित्य में ही नहीं,
बल्कि आयुर्वेद और ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में भी सूर्य का महत्व
प्रतिपादित किया गया है।
सूर्य के आदित्य मंत्र
विनियोग : ॐ आकृष्णेनि मंत्रस्य हिरण्यस्तूपांगिरस ऋषि स्त्रिष्टुप्छंद: सूर्यो देवता सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:
देहांगन्यास
: आकृष्णेन शिरसि, रजसा ललाटे, वर्तमानो मुखे, निवेशयन हृदये, अमृतं नाभौ,
मर्त्यं च कट्याम, हिरण्येन सविता ऊर्व्वौ, रथेना जान्वो:, देवो याति
जंघयो:, भुवनानि पश्यन पादयो:
करन्यास
: आकृष्णेन रजसा अंगुष्ठाभ्याम नम:, वर्तमानो निवेशयन तर्जनीभ्याम नम:,
अमृतं: मर्त्यं च मध्यामाभ्याम नम:, हिरण्ययेन अनामिकाभ्याम नम:, सविता
रथेना कनिष्ठिकाभ्याम नम:, देवो याति भुवनानि पश्यन करतलपृष्ठाभ्याम नम:
हृदयादिन्यास
: आकृष्णेन रजसा हृदयाय नम:, वर्तमानो निवेशयन शिरसे स्वाहा, अमृतं
मर्त्यं च शिखायै वषट, हिरण्येन कवचाय हुम, सविता रथेना नेत्रत्र्याय वौषट,
देवो याति भुवनानि पश्यन अस्त्राय फ़ट (दोनों हाथों को सिर के ऊपर घुमाकर
दायें हाथ की पहली दोनों उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें।)
ध्यानम : पदमासन: पद मकरो द्विबाहु: पद मद्युति: सप्ततुरंगवाहन: । दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विद्धातु देव:।
सूर्य गायत्री : ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात।
सूर्य
बीज मंत्र : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ आकृष्णेन रजसा
वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि
पश्यन ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ॐ सूर्याय नम: ।।सूर्य जप
मंत्र : ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम: । नित्य जाप 7000 प्रतिदिन।
चन्द्र के साथ इसकी मित्रता है।अमावस्या के दिन यह अपने आगोश में लेलेता है।
मंगल भी सूर्य का मित्र है।
बुध भी सूर्य का मित्र है तथा हमेशा सूर्य के आसपास घूमा करता है।
गुरु बृहस्पति यह सूर्य का परम मित्र है, दोनो के संयोग से जीवात्मा का संयोग माना जाता है। गुरु जीव है तो सूर्य आत्मा.
शनि
सूर्य का पुत्र है लेकिन दोनो की आपसी दुश्मनी है, जहां से सूर्य की सीमा
समाप्त होती है, वहीं से शनि की सीमा चालू हो जाती है।"छाया मर्तण्ड
सम्भूतं" के अनुसार सूर्य की पत्नी छाया से शनि की उतपत्ति मानी जाती है।
सूर्य और शनि के मिलन से जातक कार्यहीन हो जाता है, सूर्य आत्मा है तो शनि
कार्य, आत्मा कोई काम नहीं करती है। इस युति से ही कर्म हीन विरोध देखने को
मिलता है।
शुक्र रज है सूर्य गर्मी स्त्री जातक और पुरुष जातक के आमने सामने होने पर रज जल जाता है। सूर्य का शत्रु है।
राहु सूर्य का दुश्मन है। एक साथ होने पर जातक के पिता को विभिन्न समस्याओं से ग्रसित कर देता है।
केतु यह सूर्य से सम है।
सूर्य का अन्य ग्रहों के साथ होने पर ज्योतिष से किया जाने वाला फ़ल कथन
सूर्य
और चन्द्र दोनो के एक साथ होने पर सूर्य को पिता और चन्द्र को यात्रा
मानने पर पिता की यात्रा के प्रति कहा जा सकता है। सूर्य राज्य है तो
चन्द्र यात्रा , राजकीय यात्रा भी कही जा सकती है। एक संतान की उन्नति जन्म
स्थान से बाहर होती है।
सूर्य
और मंगल के साथ होने पर मंगल शक्ति है अभिमान है, इस प्रकार से पिता
शक्तिशाली और प्रभावी होता है।मंगल भाई है तो वह सहयोग करेगा,मंगल रक्त है
तो पिता और पुत्र दोनो में रक्त सम्बन्धी बीमारी होती है, ह्रदय रोग भी हो
सकता है। दोनो ग्रह १-१२ या १७ में हो तो यह जरूरी हो जाता है। स्त्री चक्र
में पति प्रभावी होता है, गुस्सा अधिक होता है, परन्तु आपस में प्रेम भी
अधिक होता है,मंगल पति का कारक बन जाता है।
सूर्य
और बुध में बुध ज्ञानी है, बली होने पर राजदूत जैसे पद मिलते है, पिता
पुत्र दोनो ही ज्ञानी होते हैं।समाज में प्रतिष्ठा मिलती है। जातक के अन्दर
वासना का भंडार होता है, दोनो मिलकर नकली मंगल का रूप भी धारण करलेता है।
पिता के बहन हो और पिता के पास भूमि भी हो, पिता का सम्बन्ध किसी महिला से
भी हो।
सूर्य
और गुरु के साथ होने पर सूर्य आत्मा है,गुरु जीव है। इस प्रकार से यह
संयोग एक जीवात्मा संयोग का रूप ले लेता है।जातक का जन्म ईश्वर अंश से हो,
मतलब परिवार के किसी पूर्वज ने आकर जन्म लिया हो,जातक में दूसरों की सहायता
करने का हमेशा मानस बना रहे, और जातक का यश चारो तरफ़ फ़ैलता रहे, सरकारी
क्षेत्रों में जातक को पदवी भी मिले। जातक का पुत्र भी उपरोक्त कार्यों में
संलग्न रहे, पिता के पास मंत्री जैसे काम हों, स्त्री चक्र में उसको सभी
प्रकार के सुख मिलते रहें, वह आभूषणों आदि से कभी दुखी न रहे, उसे अपने घर
और ससुराल में सभी प्रकार के मान सम्मान मिलते रहें.
सूर्य
और शुक्र के साथ होने पर सूर्य पिता है और शुक्र भवन, वित्त है, अत: पिता
के पास वित्त और भवन के साथ सभी प्रकार के भौतिक सुख हों, पुत्र के बारे
में भी यह कह सकते हैं।शुक्र रज है और सूर्य गर्मी अत: पत्नी को गर्भपात
होते रहें, संतान कम हों,१२ वें या दूसरे भाव में होने पर आंखों की बीमारी
हो, एक आंख का भी हो सकता है। ६ या ८ में होने पर जीवन साथी के साथ भी यह
हो सकता है। स्त्री चक्र में पत्नी के एक बहिन हो जो जातिका से बडी हो,
जातक को राज्य से धन मिलता रहे, सूर्य जातक शुक्र पत्नी की सुन्दरता बहुत
हो। शुक्र वीर्य है और सूर्य गर्मी जातक के संतान पैदा नहीं हो। स्त्री की
कुन्डली में जातिका को मूत्र सम्बन्धी बीमारी देता है। अस्त शुक्र
स्वास्थ्य खराब करता है।
सूर्य
और शनि के साथ होने पर शनि कर्म है और सूर्य राज्य, अत: जातक के पिता का
कार्य सरकारी हो, सूर्य पिता और शनि जातक के जन्म के समय काफ़ी परेशानी हुई
हो। पिता के सामने रहने तक पुत्र आलसी हो, पिता और पुत्र के साथ रहने पर
उन्नति नहीं हो। वैदिक ज्योतिष में इसे पितृ दोष माना जाता है। अत: जातक को
रोजाना गायत्री का जाप २४ या १०८ बार करना चाहिये।
सूर्य
और राहु के एक साथ होने पर सूचना मिलती है कि जातक के पितामह प्रतिष्ठित
व्यक्ति होने चाहिये, एक पुत्र सूर्य अनैतिक राहु हो, कानून विरुद्ध जातक
कार्य करता हो, पिता की मौत दुर्घटना में हो, जातक के जन्म के समय में पिता
को चोट लगे,जातक को संतान कठिनाई से हो, पिता के किसी भाई को अनिष्ठ हो।
शादी में अनबन हो।
सूर्य और केतु साथ होने पर पिता और पुत्र दोनों धार्मिक हों, कार्यों में कठिनाई हो, पिता के पास भूमि हो लेकिन किसी काम की नहीं हो।
सूर्य के साथ अन्य ग्रहों के अटल नियम जो कभी असफ़ल नही हुये
सूर्य मंगल गुरु=सर्जन
सूर्य मंगल राहु=कुष्ठ रोग
सूर्य मंगल शनि केतु=पिता अन्धे हों
सूर्य के आगे शुक्र = धन हों.
सूर्य के आगे बुध = जमीन हो।
सूर्य केतु =पिता राजकीय सेवा में हों,साधु स्वभाव हो,अध्यापक का कार्य भी हो सकता है।
सूर्य बृहस्पति के आगे = जातक पिता वाले कार्य करे.
सूर्य शनि शुक्र बुध =पेट्रोल,डीजल वाले काम।
सूर्य राहु गुरु =अधिकारी.
सूर्य के आगे मंगल राहु हों तो पैतृक सम्पत्ति समाप्त.
बारह भावों में सूर्य की स्थिति
प्रथम भाव में सूर्य -स्वाभिमानी, शूरवीर, पर्यटन प्रिय, क्रोधी परिवार से व्यथित, धन में कमी ,वायु पित्त आदि से शरीर में कमजोरी.
दूसरे
भाव में सूर्य - भाग्यशाली, पूर्ण सुख की प्राप्ति, धन अस्थिर लेकिन उत्तम
कार्यों के अन्दर व्यय, स्त्री के कारण परिवार में कलह, मुख और नेत्र रोग,
पत्नी को ह्रदय रोग. शादी के बाद जीवन साथी के पिता को हानि.
तीसरे
भाव में सूर्य - प्रतापी, पराक्रमी, विद्वान, विचारवान, कवि, राज्यसुख,
मुकद्दमे में विजय, भाइयों के अन्दर राजनीति होने से परेशानी.
चौथे
भाव में सूर्य - ह्रदय में जलन, शरीर से सुन्दर, गुप्त विद्या प्रेमी,
विदेश गमन, राजकीय चुनाव आदि में विजय, युद्ध वाले कारण, मुकद्दमे आदि में
पराजित, व्यथित मन.
पंचम
भाव में सूर्य - कुशाग्र बुद्धि, धीरे धीरे धन की प्राप्ति, पेट की
बीमारियां, राजकीय शिक्षण संस्थानो से लगाव,मोतीझारा,मलेरिया बुखार.
छठवें भाव में सूर्य - निरोगी न्यायवान, शत्रु नाशक, मातृकुल से कष्ट.
सप्तम भाव में सूर्य - कठोर आत्म रत, राज्य वर्ग से पीडित,व्यापार में हानि, स्त्री कष्ट.
आठवें भाव में सूर्य - धनी, धैर्यवान, काम करने के अन्दर गुस्सा, चिन्ता से ह्रदय रोग, आलस्य से धन नाश, नशे आदि से स्वास्थ्य खराब.
नवें भाव में सूर्य - योगी, तपस्वी, ज्योतिषी,साधक,सुखी, लेकिन स्वभाव से क्रूर.
दसवें भाव में सूर्य - व्यवहार कुशल, राज्य से सम्मान, उदार, ऐश्वर्य, माता को नकारात्मक विचारों से कष्ट, अपने ही लोगों से बिछोह.
ग्यारहवें
भाव में सूर्य - धनी, सुखी ,बलवान , स्वाभिमानी, सदाचारी, शत्रुनाशक,
अनायास सम्पत्ति की प्राप्ति, पुत्र की पत्नी या पुत्री के पति (दामाद) से
कष्ट.
बारहवें भाव में सूर्य - उदासीन, आलसी, नेत्र रोगी, मस्तिष्क रोगी, लडाई झगडे में विजय,बहस करने की आदत.
हस्त रेखा में सूर्य
जीवन
में पडने वाले प्रभाव को हथेली में अनामिका उंगली की जड में सूर्य पर्वत
और उस पर बनी रेखाओं को देख कर सूर्य की स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
सूर्य पर्वत पर बनी रेखायें ही सूर्य रेखा या सूर्य रेखायें कहलाती
है।अनामिका उंगली के तर्जनी से लम्बी होने की स्थिति में ही व्यक्ति के
राजकीय जीवन का फ़ल कथन किया जाता है। उन्नत पर्वत होने पर और पर्वत के
मध्य सूक्ष्म गोल बिन्दु होने पर पर्वत के गुलाबी रंग का होने पर
प्रतिष्ठ्त पद का कथन किया जाता है। इसी पर्वत के नीचे विवाह रेखा के उदय
होने पर विवाह में राजनीति के चलते विवाह टूटने और अनैतिक सम्बन्धों की
जानकारी मिलती है।
अंकशास्त्र में सूर्य
ज्योतिष
विद्याओं में अंक विद्या भी एक महत्वपूर्ण विद्या है। जिसके द्वारा हम
थोडे समय में ही प्रश्न कर्ता के उत्तर दे सकते है।अंक विद्या में "१" का
अंक सूर्य को प्राप्त हुआ है। जिस तारीख को आपका जन्म हुआ है, उन तारीखों
में अगर आपकी जन्म तारीख १,१०,१९,२८, है तो आपका भाग्यांक सूर्य का नम्बर
"१" ही माना जायेगा.इसके अलावा जो आपका कार्मिक नम्बर होगा वह जन्म
तारीख,महिना, और पूरा सन जोडने के बाद जो प्राप्त होगा, साथ ही कुल मिलाकर
अकेले नम्बर को जब सामने लायेंगे, और वह नम्बर एक आता है तो कार्मिक नम्बर
ही माना जायेगा.जिन लोगों के जन्म तारीख के हिसाब से "१" नम्बर ही आता है
उनके नाम अधिकतर ब, म, ट, और द से ही चालू होते देखे गये हैं।
अम्क
१ शुरुआती नम्बर है, इसके बिना कोई भी अंक चालू नहीं हो सकता है। इस अंक
वाला जातक स्वाभिमानी होता है, उसके अन्दर केवल अपने ही अपने लिये सुनने की
आदत होती है। जातक के अन्दर ईमानदारी भी होती है, और वह किसी के सामने
झुकने के लिये कभी राजी नहीं होता है। वह किसी के अधीन नहीं रहना चाहता है
और सभी को अपने अधीन रखना चाहता है।
अंक
१ वाला जातक अपने ही अंक के अधीन होकर यानी अपने ही अंक की तारीखों में
काम करता है तो उसको सफ़लता मिलती चली जाती है। सूर्य प्रधान जातक बहुत
तेजस्वी सदगुणी विद्वान उदार स्वभाव दयालु, और मनोबल में आत्मबल से पूर्ण
होता है। वह अपने कार्य स्वत: ही करता है
किसी
के भरोसे रह कर काम करना उसे नहीं आता है। वह सरकारी नौकरी और सरकारी
कामकाज के प्रति समर्पित होता है। वह अपने को अल्प समय में ही कुशल प्रसाशक
बनालेता है। सूर्य प्रधान जातक में कुछ बुराइयां भी होतीं हैं।
जैसे
अभिमान,लोभ,अविनय,आलस्य,बाह्य दिखावा,जल्दबाजी,अहंकार, आदि दुर्गुण उसके
जीवन में भरे होते हैं। इन दुर्गुणों के कारण उसका विकाश सही तरीके से नहीं
हो पाता है। साथ ही अपने दुश्मनो को नहीं पहिचान पाने के कारण उनसे
परेशानी ही उठाता रहता है।
हर
काम में दखल देने की आदत भी जातक में होती है। और सब लोगों के काम के
अन्दर टांग अडाने के कारण वह अधिक से अधिक दुश्मनी भी पैदा कर लेता है।
सूर्य ग्रह सम्बन्धी अन्य विवरण
सूर्य
प्रत्यक्ष देवता है, सम्पूर्ण जगत के नेत्र हैं। इन्ही के द्वारा दिन और
रात का सृजन होता है। इनसे अधिक निरन्तर साथ रहने वाला और कोई देवता नहीं
है। इन्ही के उदय होने पर सम्पूर्ण जगत का उदय होता है, और इन्ही के अस्त
होने पर समस्त जगत सो जाता है।
इन्ही
के उगने पर लोग अपने घरों के किवाड खोल कर आने वाले का स्वागत करते हैं,
और अस्त होने पर अपने घरों के किवाड बन्द कर लेते हैं। सूर्य ही कालचक्र के
प्रणेता है।
सूर्य
से ही दिन रात पल मास पक्ष तथा संवत आदि का विभाजन होता है। सूर्य
सम्पूर्ण संसार के प्रकाशक हैं। इनके बिना अन्धकार के अलावा और कुछ नहीं
है।
सूर्य
आत्माकारक ग्रह है, यह राज्य सुख,सत्ता,ऐश्वर्य,वैभव,अधिकार, आदि प्रदान
करता है। यह सौरमंडल का प्रथम ग्रह है, कारण इसके बिना उसी प्रकार से हम
सौरजगत को नहीं जान सकते थे, जिस प्रकार से माता के द्वारा पैदा नहीं करने
पर हम संसार को नहीं जान सकते थे। सूर्य सम्पूर्ण सौर जगत का आधार स्तम्भ
है।
अर्थात
सारा सौर मंडल,ग्रह,उपग्रह,नक्षत्र आदि सभी सूर्य से ही शक्ति पाकर इसके
इर्द गिर्द घूमा करते है, यह सिंह राशि का स्वामी है,परमात्मा ने सूर्य को
जगत में प्रकाश करने,संचालन करने, अपने तेज से शरीर में ज्योति प्रदान
करने, तथा जठराग्नि के रूप में आमाशय में अन्न को पचाने का कार्य सौंपा है।
ज्योतिष
शास्त्र में सूर्य को मस्तिष्क का अधिपति बताया गया है,ब्रह्माण्ड में
विद्यमान प्रज्ञा शक्ति और चेतना तरंगों के द्वारा मस्तिष्क की गतिशीलता
उर्वरता और सूक्षमता के विकाश और विनाश का कार्य भी सूर्य के द्वारा ही
होता है। यह संसार के सभी जीवों द्वारा किये गये सभी कार्यों का साक्षी है।
और न्यायाधीश के सामने साक्ष्य प्रस्तुत करने जैसा काम करता है।
यह
जातक के ह्रदय के अन्दर उचित और अनुचित को बताने का काम करता है, किसी भी
अनुचित कार्य को करने के पहले यह जातक को मना करता है, और अंदर की आत्मा से
आवाज देता है। साथ ही जान बूझ कर गलत काम करने पर यह ह्रदय और हड्डियों
में कम्पन भी प्रदान करता है। गलत काम को रोकने के लिये यह ह्रदय में साहस
का संचार भी करता है।
जो
जातक अपनी शक्ति और अंहकार से चूर होकर जानते हुए भी निन्दनीय कार्य करते
हैं, दूसरों का शोषण करते हैं, और माता पिता की सेवा न करके उनको नाना
प्रकार के कष्ट देते हैं, सूर्य उनके इस कार्य का भुगतान उसकी विद्या,यश,
और धन पर पूर्णत: रोक लगाकर उसे बुद्धि से दीन हीन करके पग पग पर अपमानित
करके उसके द्वारा किये गये कर्मों का भोग करवाता है। आंखों की रोशनी का
अपने प्रकार से हरण करने के बाद भक्ष्य और अभक्ष्य का भोजन करवाता है, ऊंचे
और नीचे स्थानों पर गिराता है, चोट देता है।
श्रेष्ठ
कार्य करने वालों को सदबुद्धि,विद्या,धन, और यश देकर जगत में नाम देता है,
लोगों के अन्दर इज्जत और मान सम्मान देता है। उन्हें उत्तम यश का भागी बना
कर भोग करवाता है। जो लोग आध्यात्म में अपना मन लगाते हैं, उनके अन्दर
भगवान की छवि का रसस्वादन करवाता है। सूर्य से लाल स्वर्ण रंग की किरणें न
मिलें तो कोई भी वनस्पति उत्पन्न नहीं हो सकती है। इन्ही से यह जगत स्थिर
रहता है,चेष्टाशील रहता है, और सामने दिखाई देता है।
जातक
अपना हाथ देख कर अपने बारे में स्वयं निर्णय कर सकता है, यदि सूर्य रेखा
हाथ में बिलकुल नहीं है, या मामूली सी है, तो उसके फ़लस्वरूप उसकी विद्या
कम होगी, वह जो भी पढेगा वह कुछ कल बाद भूल जायेगा,धनवान धन को नहीं रोक
पायेंगे, पिता पुत्र में विवाद होगा, और अगर इस रेखा में द्वीप आदि है तो
निश्चित रूप से गलत इल्जाम लगेंगे.अपराध और कोई करेगा और सजा जातक को
भुगतनी पडेगी.
सूर्य
क्रूर ग्रह भी है, और जातक के स्वभाव में तीव्रता देता है। यदि ग्रह तुला
राशि में नीच का है तो वह तीव्रता जातक के लिये घातक होगी, दुनियां की कोई
औषिधि,यंत्र,जडी,बूटी नहीं है जो इस तीव्रता को कम कर सके।
केवल सूर्य मंत्र में ही इतनी शक्ति है, कि जो इस तीव्रता को कम कर सकता है।
सूर्य
जीव मात्र को प्रकाश देता है। जिन जातकों को सूर्य आत्मप्रकाश नहीं देता
है, वे गलत से गलत औ निंदनीय कार्य क बैठते है। और यह भी याद रखना चाहिये
कि जो कर्म कर दिया गया है, उसका भुगतान तो करना ही पडेगा.जिन जातकों के
हाथ में सूर्य रेखा प्रबल और साफ़ होती है, उन्हे समझना चाहिये कि सूर्य
उन्हें पूरा बल दे रहा है। इस प्रकार के जातक कभी गलत और निन्दनीय कार्य
नहीं कर सकते हैं। उनका ओज और तेज सराहनीय होता है।
सूर्य ग्रह से प्रदान किये जाने वाले रोग
जातक
के गल्ती करने और आत्म विश्लेषण के बाद जब निन्दनीय कार्य किये जाते हैं,
तो सूर्य उन्हे बीमारियों और अन्य तरीके से प्रताडित करने का काम करता है,
सबसे बड़ा रोग निवारण का उपाय है कि किये जाने वाले गलत और निन्दनीय
कार्यों के प्रति पश्चाताप, और फ़िर से नहीं करने की कसम, और जब प्रायश्चित
कर लिया जाय तो रोगों को निवारण के लिये रत्न,जडी, बूटियां, आदि धारण की
जावें, और मंत्रों का नियमित जाप किया जावे.सूर्य ग्रह के द्वारा प्रदान
कियेजाने वाले रोग है- सिर दर्द,बुखार, नेत्र विकार,मधुमेह,मोतीझारा,पित्त
रोग,हैजा,हिचकी. यदि औषिधि सेवन से भी रोग ना जावे तो समझ लेना कि सूर्य की
दशा या अंतर्दशा लगी हुई है। और बिना किसी से पूंछे ही मंत्र जाप,रत्न या
जडी बूटी का प्रयोग कर लेना चाहिये। इससे रोग हल्का होगा और ठीक होने
लगेगा।
सूर्य ग्रह के रत्न उपरत्न
सूर्य
ग्रह के रत्नों में माणिक और उपरत्नो में लालडी, तामडा, और महसूरी.पांच
रत्ती का रत्न या उपरत्न रविवार को कृत्तिका नक्षत्र में अनामिका उंगली में
सोने में धारण करनी चाहिये। इससे इसका दुष्प्रभाव कम होना चालू हो जाता
है। और अच्छा रत्न पहिनते ही चालीस प्रतिशत तक फ़ायदा होता देखा गया है।
रत्न की विधि विधान पूर्वक उसकी ग्रहानुसार प्राण प्रतिष्ठा अगर नहीं की
जाती है, तो वह रत्न प्रभाव नहीं दे सकता है। इसलिये रत्न पहिनने से पहले
अर्थात अंगूठी में जडवाने से पहले इसकी प्राण प्रतिष्ठा करलेनी चाहिये।
क्योंकि पत्थर तो अपने आप में पत्थर ही है, जिस प्रकार से मूर्तिकार मूर्ति
को तो बना देता है, लेकिन जब उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है, तो
उसकी विधि विधान पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद ही वह मूर्ति अपना असर
दे सकती है। इसी प्रकार से अंगूठी में रत्न तभी अपना असर देगा जब उसकी
विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की जायेगी.
सूर्य ग्रह की जडी बूटियां
बेल
पत्र जो कि शिवजी पर चढाये जाते है, आपको पता होगा, उसकी जड रविवार को
हस्त या कृत्तिका नक्षत्र में लाल धागे से पुरुष दाहिने बाजू में और
स्त्रियां बायीं बाजू में बांध लें, इस के द्वारा जो रत्न और उपरत्न खरीदने
में अस्मर्थ है, उनको भी फ़ायदा होगा।
सूर्य ग्रह के लिये दान
सूर्य
ग्रह के दुष्प्रभाव से बचने के लिये अपने बजन के बराबर के गेंहूं, लाल और
पीले मिले हुए रंग के वस्त्र, लाल मिठाई, सोने के रबे, कपिला गाय, गुड और
तांबा धातु, श्रद्धा पूर्वक किसी गरीब ब्राहमण को बुलाकर विधि विधान से
संकल्प पूर्वक दान करना चाहिये।
सूर्य ग्रह से प्रदत्त व्यापार और नौकरी
स्वर्ण
का व्यापार, हथियारों का निर्माण, ऊन का व्यापार, पर्वतारोहण प्रशिक्षण,
औषधि विक्रय, जंगल की ठेकेदारी, लकड़ी या फ़र्नीचर बेचने का काम, बिजली
वाले सामान का व्यापार आदि सूर्य ग्रह की सीमा रेखा में आते है। शनि के साथ
मिलकर हार्डवेयर का काम, शुक्र के साथ मिलकर पेन्ट और रंगरोगन का काम, बुध
के साथ मिलकर रुपया पैसा भेजने और मंगाने का काम, आदि हैं। सचिव, उच्च
अधिकारी, मजिस्ट्रेट, साथ ही प्रबल राजयोग होने पर राष्ट्रपति, प्रधान
मंत्री, राज्य मंत्री, संसद सदस्य, इन्जीनियर, न्याय सम्बन्धी कार्य,
राजदूत, और व्यवस्थापक आदि के कार्य नौकरी के क्षेत्र में आते हैं। सूर्य
की कमजोरी के लिये सूर्य के सामने खडे होकर नित्य सूर्य स्तोत्र, सूर्य
गायत्री, सूर्य मंत्र आदि का जाप करना हितकर है
सूर्य के लिये आदित्य मंत्र
विनियोग :-ॐ आकृष्णेनि मन्त्रस्य हिरण्यस्तूपांगिरस ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्द: सूर्यो देवता सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:
देहान्गन्यास
:- आकृष्णेन शिरसि, रजसा ललाटे, वर्तमानो मुखे, निवेशयन ह्रदये, अमृतं
नाभौ, मर्त्यं च कट्याम, हिरण्येन सविता ऊर्व्वौ, रथेना जान्वो:, देवो याति
जंघयो:- भुवनानि पश्यन पादयो:-
करन्यास
:- आकृष्णेन रजसा अंगुष्ठाभ्याम नम:, वर्तमानो निवेशयन तर्जनीभ्याम नम:,
अमृतं मर्त्यं च मध्यामाभ्याम नम:, हिरण्ययेन अनामिकाभ्याम नम:, सविता
रथेना कनिष्ठिकाभ्याम नम:, देवो याति भुवनानि पश्यन करतलपृष्ठाभ्याम नम:
ह्रदयादिन्यास
:- आकृष्णेन रजसा ह्रदयाय नम:, वर्तमानो निवेशयन शिरसे स्वाहा, अमृतं
मर्त्यं च शिखायै वषट, हिरण्येन कवचाय हुम, सविता रथेना नेत्रत्र्याय वौषट,
देवो याति भुवनानि पश्यन अस्त्राय फ़ट (दोनो हाथों को सिर के ऊपर घुमाकर
दायें हाथ की पहली दोनों उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें.
ध्यानम :- पदमासन: पद मकरो द्विबाहु: पद मद्युति: सप्ततुरंगवाहन:। दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देव: ॥
सूर्य गायत्री :- ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात.
सूर्य
बीज मंत्र :- ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ॐ भूभुर्व: स्व: ॐ आकृष्णेन रजसा
वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि
पश्यन ऊँ स्व: भुव: भू: ॐ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ॐ सूर्याय नम: ॥
सूर्य जप मंत्र :- ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ स: सूर्याय नम:। नित्य जाप ७००० प्रतिदिन।
सूर्याष्टक स्तोत्र
आदि देव: नमस्तुभ्यम प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यम प्रभाकर नमोअस्तु ते ॥
सप्त अश्व रथम आरूढम प्रचंडम कश्यप आत्मजम। श्वेतम पदमधरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥
लोहितम रथम आरूढम सर्वलोकम पितामहम। महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम
त्रैगुण्यम च महाशूरम ब्रह्मा विष्णु महेश्वरम। महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥
बृंहितम तेज: पुंजम च वायुम आकाशम एव च। प्रभुम च सर्वलोकानाम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥
बन्धूक पुष्प संकाशम हार कुण्डल भूषितम। एक-चक्र-धरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥
तम
सूर्यम जगत कर्तारम महा तेज: प्रदीपनम। महापाप हरम देवम तम सूर्यम
प्रणमामि अहम ॥सूर्य-अष्टकम पठेत नित्यम ग्रह-पीडा प्रणाशनम। अपुत्र: लभते
पुत्रम दरिद्र: धनवान भवेत ॥
आमिषम मधुपानम च य: करोति रवे: दिने। सप्त जन्म भवेत रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥
स्त्री तैल मधु मांसानि य: त्यजेत तु रवेर दिने। न व्याधि: शोक दारिद्रयम सूर्यलोकम गच्छति
सूर्याष्टक
सिद्ध स्तोत्र है, प्रात: स्नानोपरान्त तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ
देना चाहिये, तदोपरान्त सूर्य के सामने खडे होकर सूर्य को देखते हुए १०८
पाठ नित्य करने चाहिये। नित्य पाठ करने से मान, सम्मान, नेत्र ज्योति
जीवनोप्रयन्त बनी रहेगी!