Tuesday, 28 December 2021

महादेव शिव का यतिनाथ अवतार


 
नंदीश्वर जी मुनि सनत्कुमार को कहते हैं - मुने ! अब मैं परमात्मा शिव के यतिनाथ नामक अवतार का वर्णन करता हूं।
 
मुनीश्वर ! एक समय अर्बुदाचल नामक पर्वत पर किसी समय एक भील - दंपत्ति रहता था। भील का नाम आहुक और भीलनी का नाम आहुका था। वे दोनों महान शिव - भक्त थे तथा शिव की आराधन - पूजन में लगे रहते थे। एक दिन वह शिव भक्त भील अपनी पत्नी के लिए भोजन की खोज में वन में काफी दूर चला गया। उसी दिन उधर सायं के समय भील की परीक्षा लेने के लिए भगवान शंकर एक संन्यासी का रूप धारण कर के उसके घर आ गए। थोड़ी देर बाद ही वह भील भी वापस घर आ गया। उसने बड़े प्रेम से उस संन्यासी (यतिराज) का पूजन किया।
 
भील के मनोभाव की परीक्षा लेने के लिए यतीश्वर ने दीन-वाणी में कहा - मैं सवेरा होते ही चला जाऊंगा।आज रात को यहां रहने के लिए मुझे स्थान दे दो। तुम्हारा सदा कल्याण होगा। भील ने कहा - मेरे घर में स्थान बहुत थोड़ा है। उसमें आपका रहना कैसे हो सकता है ? भील की बात सुनकर संन्यासी यानी यतिनाथ जी वहां से चले जाने को उद्यत हुए। 
 
तब उनकी पत्नी आहुका ने कहा - घर आए अतिथि को निराश न कर उन्हें स्थान दे दीजिए। आप संन्यासी के साथ सुखपूर्वक भीतर रहिए और मैं बाहर घर के बाहर खड़ी रहूंगी।
पत्नी की बात सुनकर भील ने कहा - ऐसा कैसे हो सकता है कि अपनी पत्नी को घर से बाहर निकाल कर मैं घर के भीतर रहूं ? संन्यासी का बाहर जाना भी मेरे लिए अधर्म कारक होगा। मुझे ही घर के बाहर रहना चाहिए - ऐसा सोच कर उसने आग्रह करके अपनी स्त्री और संन्यासी को आनंद के साथ घर के भीतर रहने दिया और स्वयं अपने आयुध पास रख कर घर से बाहर खड़ा हो गया।
 
रात्रि के समय कई हिंसक पशुओं ने उस भील पर आक्रमण कर दिया और उसे मार डाला।
सुबह उठकर यती ने देखा कि भील को मार डाला गया है , तब उन्हें बड़ा दुख हुआ। संन्यासी को दु:खी देखकर भीलनी ने अपने दु:ख को दबाकर बोली - स्वामी जी ! आप दुखी क्यों हो रहे हैं ? इन भीलराज का तो इसमें कल्याण हो गया। अपने आतिथ्य - धर्म का पालन करते हुए इनकी मृत्यु हुई है। अब मैं चिता की आग में जलकर इनका अनुसरण करूंगी। आप प्रसन्नतापूर्वक मेरे लिए एक चिता तैयार कर दें। संन्यासी ने स्वयं चिता तैयार की और भीलनी ने अपने धर्म के अनुसार उस में प्रवेश किया।
 
तभी भगवान शंकर अपने साक्षात् स्वरूप में उसके सामने प्रकट हुए और बोले - धन्य हो ! तुम धन्य हो ! मैं तुम पर प्रसन्न हूं। तुम इच्छा अनुसार वर मांगो। भगवान शंकर का यह परम आनंददायक वचन सुनकर भीलनी को बड़ा सुख मिला। वह ऐसी विभोर हो गई कि उसे किसी बात की सुध नहीं रही। उसकी इस अवस्था को लक्ष्य करके भगवान शंकर और भी प्रसन्न हुए और उसके वर न मांगते हुए भी उसे वर देते हुए बोले - मेरा जो यतिरूप है , वह भावी जन्म में हंस रूप से प्रकट होगा। तुम्हारे पति राजा नल के नाम से विख्यात होंगे और तुम उनकी रानी दमयंती बनोगी। मैं उस समय हंस रूप में तुम दोनों का परस्पर संजोग कराऊंगा।
 
नंदेश्वर जी कहते हैं - उन्हें ऐसा कह कर भगवान शिव उस समय लिंग रूप में स्थित हो गए। भील अपने आतिथ्य धर्म से विचलित नहीं हुआ था , अतः उसी के नाम पर उस लिंग को " अचलेश " संज्ञा दी गई। सत्कारजनित पुण्य से प्रसन्न हो भगवान शिव ने हंस का रूप धारण कर उन दोनों को अगले जन्म में सुख पहुंचाया।
उपर्युक्त प्रसंग शिव पुराण से लिया गया है।
 
।। हर हर महादेव ।।

Tuesday, 21 December 2021

हनुमान जी की आठ प्रमुख सिद्धियाँ

 


सिद्धि अर्थात पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना. सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग एक कठिन मार्ग हो ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है. असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को 'सिद्धि' कहा गया है।
 
चमत्कारिक साधनों द्वारा 'अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे - दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि. 'सिद्धि' इसी अर्थ में प्रयुक्त होती है।
 
शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ प्राप्त कि जा सकती है।
सिद्धियाँ दो प्रकार की होती हैं, एक परा और दूसरी अपरा. यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं।
 
सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियांकहलाती है।
मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं. इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता.सिद्धियां क्या हैं व इनसे क्या हो सकता है । 

इन सभी का उल्लेख मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में प्राप्त होता है जो इस प्रकार है:-
अणिमा लघिमा गरिमा प्राप्ति: प्राकाम्यंमहिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वंच सर्वकामावशायिता:।।
यह आठ मुख्य सिद्धियाँ इस प्रकार हैं:-
 
अणिमा सिद्धि
अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता ही अणिमा है. यह सिद्धि यह वह सिद्धि है, जिससे युक्त हो कर व्यक्ति सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है. इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है. अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है. अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल पाता है.
 
महिमा सिद्धि
अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा कहा जाता है. यह आकार को विस्तार देती है विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है. इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में सक्षम होता है. जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं उसी प्रकार साधक भी इसे पाकर उन्हें जैसी शक्ति भी पाता है.
 
गरिमा सिद्धि
इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है. यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता .
 
लघिमा सिद्धि
स्वयं को हल्का बना लेने की क्षमता ही लघिमा सिद्धि होती है. लघिमा सिद्धि में साधक स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता है. इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उसकोलघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है.
 
प्राप्ति सिद्धि
कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर जो कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त किया जा सकता है. इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है. जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है केवल इसी सिद्धि द्वारा हीवह असंभव को भी संभव कर सकता है.
 
 
प्राकाम्य सिद्धि
कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की प्राप्ति है. इसके सिद्ध हो जाने पर मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं. इस सिद्धि में साधक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति का अनुभव करता है. इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है उसे पाने में कामयाब रहता है. व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ सकता है और यदि चाहे तो पानी पर चल सकता है.
 
ईशिता सिद्धि
हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि का अर्थ है. इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व औरअधिकार प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है. सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमाय अजा सकता है. वह चाहे राज्यों से लेकर साम्राज्य ही क्यों न हो.इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है.
 
वशिता सिद्धि
जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को वशिता या वशिकरण कही जाती है. इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु,पदार्थ- प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।


Thursday, 2 December 2021

शिव के गले में मुण्ड माला



भगवान शिव और सती का अद्भुत प्रेम शास्त्रों में वर्णित है। इसका प्रमाण है सती के यज्ञ कुण्ड में कूदकर आत्मदाह करना और सती के शव को उठाए क्रोधित शिव का तांडव करना। हालांकि यह भी शिव की लीला थी क्योंकि इस बहाने शिव 51 शक्ति पीठों की स्थापना करना चाहते थे। शिव ने सती को पहले ही बता दिया था कि उन्हें यह शरीर त्याग करना है। इसी समय उन्होंने सती को अपने गले में मौजूद मुंडों की माला का रहस्य भी बताया था।
 
मुण्ड माला का रहस्य
एक बार नारद जी के उकसाने पर सती भगवान शिव से जिद करने लगी कि आपके गले में जो मुंड की माला है उसका रहस्य क्या है। जब काफी समझाने पर भी सती न मानी तो भगवान शिव ने राज खोल ही दिया। शिव ने पार्वती से कहा कि इस मुंड की माला में जितने भी मुंड यानी सिर हैं वह सभी आपके हैं। सती इस बात का सुनकर हैरान रह गयी।
 
सती ने भगवान शिव से पूछा, यह भला कैसे संभव है कि सभी मुंड मेरे हैं। इस पर शिव बोले यह आपका 108 वां जन्म है। इससे पहले आप 107 बार जन्म लेकर शरीर त्याग चुकी हैं और ये सभी मुंड उन पूर्व जन्मों की निशानी है। इस माला में अभी एक मुंड की कमी है इसके बाद यह माला पूर्ण हो जाएगी। शिव की इस बात को सुनकर सती ने शिव से कहा मैं बार-बार जन्म लेकर शरीर त्याग करती हूं लेकिन आप शरीर त्याग क्यों नहीं करते।
 
शिव हंसते हुए बोले श्मैं अमर कथा जानता हूं इसलिए मुझे शरीर का त्याग नहीं करना पड़ता।श् इस पर सती ने भी अमर कथा जानने की इच्छा प्रकट की। शिव जब सती को कथा सुनाने लगे तो उन्हें नींद आ गयी और वह कथा सुन नहीं पायी। इसलिए उन्हें दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग करना पड़ा।
 
शिव ने सती के मुंड को भी माला में गूंथ लिया। इस प्रकार 108 मुंड की माला तैयार हो गयी। सती ने अगला जन्म पार्वती के रूप में हुआ। इस जन्म में पार्वती को अमरत्व प्राप्त होगा और फिर उन्हें शरीर त्याग नहीं करना पड़ा !