नवरात्रों में दूसरे दिन मां शक्ति के ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ है ब्रह्म का आचरण करने वाली। दुर्गा के दूसरे स्वरूप में ब्रह्मचारिणी पर मंगल ग्रह पर अपना आधिपत्य रखती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी उस बच्चे की अवस्था को संबोधित करती हैं जो अब बड़ा हो रहा है, विद्यार्थी है व जिसका उद्देश शक्ति प्राप्त करना है।
देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप खिलते कमल जैसा है जिसमें से प्रकाश निकल रहा है। इनका रूप ज्योर्तिमय, शांत व निमग्न होकर तप में विलीन है। इनके मुखमंडल पर कठोर तप के कारण अद्भुत तेज व कांति है। इनके दाहिने हाथ में अक्षमाला व बाएं हाथ में कमण्डल है। यह साक्षात ब्रह्मत्व का स्वरूप हैं। गौरवर्णा देवी ने ध्वल रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं। देवी के कंगन, कड़े, हार, कुंडल तथा बाली आदि सभी जगह कमल जड़े हुए हैं।
मां के इस रूप का नाम ब्रह्मचारिणी होने के पीछे धार्मिक कथा है। दरअसल जब मां शक्ति ने धरती के राजा हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और भगवान शिव को वर स्वरूप पाने के लिए तपस्या की, तब उनकी गहन तपश्चर्या के कारण ही इन्हें ब्रह्मचारिणी और तपश्चारिणी का नाम मिला।
अपने इस स्वरूप में मां ने हजार वर्षों तक भोलेनाथ का ध्यान किया। फिर कई हजार वर्षों तक तप के दौरान मां ने सिर्फ फल-फूल ग्रहण किए। कठिन तप और उपवास किए। मां की महिमा वर्णित करते कई धर्मग्रंथों में बताया गया है कि मां ने धूप, तेज वर्षा और आंधी-तूफान में भी निरंतर आराधना की। इस पर भी जब प्रभु प्रसन्न नहीं हुए तो मां ने सूखे बिल्व पत्र खाकर और कई हजार साल तक निर्जल हरकर खुद को प्रभु भक्ति में लीन रखा।
इस गहन तपस्या के कारण मां बहुत कमजोर हो गईं। तब मां को भगवान शिव के पति रूप में प्राप्त होने का वरदान मिला। मां तपस्या पूर्ण कर अपने पिता के घर लौट गईं। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से विद्यार्थियों और साधू-संतों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। अगर आप पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र से जुड़े हैं तो आपको इस विशेष दिन मां का अर्चन जरूर करना चाहिए। मां का यह रूप तप और आराधना का प्रतीक है।
पूजा विधि
सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमंत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात माता ब्रह्मचारिणी की पूजा करें।
देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें। इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को लाल फूल काफी पसंद है। घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।
इस मंत्र से करें मां ब्रह्मचारिणी की अराधना
या देवी सर्वभूतेषु ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
मां ब्रह्मचारिणी की कथा
एक कथा के अनुसार पूर्वजन्म में मां ब्रह्मचारिणी की पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं. भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए मां ब्रह्मचारिणी ने कठोर तप किया. इसीलिए इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया. पौराणिक कथा के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी ने एक हजार वर्ष तक फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया. इसके बाद मां ने कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप को सहन करती रहीं. टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं. भोले नाथ प्रसन्न नहीं हुए तो उन्होने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए और कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं. पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया. मां ब्रह्मचारणी कठिन तपस्या के कारण बहुत कमजोर हो हो गई. इस तपस्या को देख सभी देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने सरहाना की और मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया.

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